शिक्षक दूसरे का मूल्यांकन करने के साथ स्वयं का मूल्यांकन करें -डा उर्मिला देवी

अमेठी ।


हरिकेश यादव -संवाददाता (इंडेविन टाइम्स)


रणवीर रणंजय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अमेठी में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी 'व्यावसायिक नीतिशास्त्र : 21वीं सदी की आवश्यकता' विषय पर शिक्षक शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग तथा मध्यकालीन इतिहास विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी के समापन समारोह का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वन्दना से हुआ।


समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली की संयुक्त सचिव डॉ0 उर्मिला देवी ने कहा संगोष्ठी का विषय समय सापेक्ष है। आज शिक्षा को पवित्र बनाने की जरूरत है जिससे मूल्यों का विकास किया जा सके। कोई भी मूल्यपरक शिक्षा हमें ठीक नहीं कर सकती। हमें अपने आप को ठीक करना होगा। हमें अपने अन्दर बैठे भगवान को सुनने की जरूरत है। हम उसके निर्णय की अवहेलना करते हैं। अगर हम अपनी सुनकर कार्य करेंगे तो हमें किसी भी प्रकार की मूल्यपरक शिक्षा की जरूरत नहीं पड़ेगी। मूल्यपरक शिक्षा पढ़ाने की नहीं उसे व्यवहार में कार्यरूप देने की जरूरत है। आज शिक्षक को सामान्य व्यक्ति नहीं उससे ऊपर उठने की जरूरत है। शिक्षा की गिरावट का जिम्मेदार स्वयं शिक्षक है।



(फोटो -डा0 उर्मिला देवी को पुष्प अर्पित करते हुए रणवीर रणंजय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के शिक्षक)


शिक्षक स्वयं दूसरो का मूल्यांकन करता है अपना स्वयं मूल्यांकन नहीं करता और न ही आदर्श शिक्षक बनना चाहता है। जब हम कम शिक्षित थे तो समाज में इथिक्स पर चर्चा नहीं होती थी। आज शिक्षा का स्तर निरन्तर बढ़ रहा है। डिग्रियाँ तो हमारे पास बहुत हैं पर हमें नीतिशास्त्र का ज्ञान नहीं है। सार्थक एवं सफल जीवन की परिभाषा को समझने की जरूरत है। बच्चा जो बनना चाहता है हमें उसे वहीं बनाना चाहिए, न कि हम अपनी इच्छा उस पर थोपें। शिक्षा का उद्देश्य अच्छा इन्सान बनाना होना चाहिए।


स्वागत करते हुए प्राचार्य डॉ0 त्रिवेणी सिंह ने कहा कि पश्चिमीकरण ने भारतीय मूल्यों को प्रभावित किया है। जिससे भारतीय समाज में विचलन की स्थिति उत्पन्न हुई। आज ऐसे नीतिशास्त्र की जरूरत है जिसके द्वारा जीवन जीने की कला का विकास हो सके।


विशिष्ट अतिथि डॉ0 सुरेन्द्र मिश्र ने कहा कि हमें अपने कर्तव्यों का सही ढ़ग से पालन करना भी इथिक्स है। इथिक्स का विकास परिवार से प्रारम्भ होना चाहिए। डॉ0 सुभाष सिंह ने दो दिवसीय संगोठी का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया और बताया कि संगोष्ठी में कुल 196 प्रतिभागियों ने सहभागिता किया। आभार व्यक्त करते हुए डॉ0 लाजो पाण्डेय ने कहा संस्कार का विकास परिवार से प्रारम्भ होता है। शिक्षण संस्थाओं की भूमिका बाद में आती है।


संगोष्ठी में तकनीकि सहयोग राजेन्द्र कुमार एवं कमलेश सिंह ने दिया। समापन समारोह में आयोजन सचिव डॉ0 राधेश्याम तिवारी, संयोजक डॉ0 एम0पी0 त्रिपाठी, डॉ0 लाल साहब सिंह, डॉ0 ओमशिव पाण्डेय, डॉ0 रामसुन्दर यादव, डॉ0 धनन्जय सिंह, डॉ0 आशीष त्रिपाठी, डॉ0 राधेश्याम प्रसाद, डॉ0 अशोक कुमार सिंह, डॉ0 प्रमिला, डॉ0 अक्षयवर नाथ तिवारी, डॉ0 अजय कुमार सिंह, डॉ0 वीरेन्द्र बहादुर सिंह, डॉ0 योगांचल मिश्र, डॉ0 भगवती थिटे, डॉ0 दयानन्द सिंह, डॉ0 धर्मेन्द्र वैश्य, डॉ0 डॉ0 देवेन्द्र मिश्र, डॉ0 सन्तोष कुमार सिंह, डॉ0 मानवेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ0 दिनेश बहादुर सिंह, डॉ0 जितेन्द्र कुमार पाण्डेय, डॉ0 ज्योति सिंह, डॉ0 विनोद कुमार यादव आदि शिक्षक उपथित रहे। संगोष्ठी का संचालन छात्रा आस्था मिश्रा ने किया।



(फोटो -डा0 उर्मिला देवी को प्रशस्ति पत्र देते हुए रणवीर रणंजय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के शिक्षक)