अपने भाइयों के सहयोग से सरकारी स्कूल का किया कायाकल्प, कॉन्वेंट से नाम कटाकर यहां पढ़ने लगे बच्चे


कौशांबी. 


गर हौसला बुलंद हो तो मंजिलें आसान हो जाती हैं। उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के शिक्षक अजय साहू ने कुछ इसी तरह की मिसाल दी है। तीन साल पहले जब अजय को प्राथमिक विद्यालय सौरई बुजुर्ग का प्रभार मिला तो तस्वीर कुछ वैसी ही थी जैसी एक सरकारी स्कूल की तस्वीर हम सभी के जेहन में उभरती है। अजय ने अपनी सैलरी का 10% हिस्सा खर्च कर स्कूल को संवारने व पढ़ाई का बेहतर माहौल बनाने पर जोर दिया। हालात कुछ सुधरे, लेकिन नाकाफी रहे। उन्होंने अपने तीन सैनिक भाईयों के सामने स्कूल को गोद लेने की इच्छा जाहिर की। तीनों भाईयों ने इसे सहर्ष स्वीकार किया और करीब 10 लाख रुपए की लागत से स्कूल का कायाकल्प कर दिया। 


नतीजा कभी 162 छात्र-छात्राओं वाले इस स्कूल में वर्तमान में 467 बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं। यह सरकारी स्कूल कॉन्वेंट को टक्कर दे रहा है। बॉर्डर पर दुश्मनों से लोहा लेने वाले सैनिक बंधुओं ने इस स्कूल से शिक्षा हासिल की थी। आज उसी स्कूल को संवार कर समाज में कभी न मिटने वाली अमिट छाप छोड़ी है। अभिभावक व बच्चे गांव में कान्वेंट जैसी शिक्षा व्यवस्था पाकर गदगद हैं। 


तीन साल में बदल गई स्कूल की तस्वीर


सिराथू तहसील के सौराई बुजुर्ग गांव की आबादी तीन हजार के करीब है। यहां स्थित प्राथमिक विद्यालय में साल 2016 -17 शिक्षण सत्र की शुरुआत में अजय साहू की बतौर प्रधानाध्यापक तैनाती हुई थी। अजय के तीन भाई अनिल, अरुण व अक्षय साहू भारतीय सेना में हैं। सभी ने प्राथमिक शिक्षा इसी स्कूल से हासिल की थी। अजय ने जब अपना प्रभार संभाला तो विद्यालय की हालत जर्जर थी। बच्चों की संख्या भी काफी कम थी। 


अजय ने स्कूल को संवारने का निर्णय लिया। शुरूआत में एक साल उन्होंने अपनी सैलरी का 10 फीसदी स्कूल को सुधारने व बच्चों के लिए संसाधन जुटाने में खर्च किया। कुछ हद तक हालत सुधरे, लेकिन जैसी इच्छा थी, वैसा होने में सामूहिक प्रयास की जरुरत थी। अजय ने अपने सैनिक भाइयों अनिल, अरुण, अक्षय साहू के सामने गांव के सरकारी स्कूल को गोद लेने का प्रस्ताव रखा। तीनों भाईयों ने इस प्रस्ताव को खुशी खुशी स्वीकार करते हुए खुलकर आर्थिक मदद की। 


प्रधानाचार्य अजय ने कहा- अब तक स्कूल के कायाकल्प में 10 लाख से अधिक रूपए खर्च हुए हैं। हर कक्षा में बच्चों के बैठने के लिए कुर्सी मेज, स्वच्छ पेयजल के लिए आरओ, हाइजेनिक टॉयलेट, खेलने के सामान, वाद्य यन्त्र, साउंड सिस्टम, पढाई के लिए प्रोजेक्टर, कम्प्यूटर, लेपटॉप आदि संसाधन उपलब्ध हैं। अजय साहू बताते हैं कि- वह अपने स्कूल के बच्चों को किताबी ज्ञान केवल चार दिन ही देते हैं। इसके बाद वह किताबों की बातों को प्रोजेक्टर के माध्यम से दिखा कर व समझाकर बताते हैं। जिससे बच्चों को पढाई में रूचि और सब्जेक्ट को समझने में मदद मिलती है। 


स्कूल की अपनी लाइब्रेरी


प्राथमिक स्कूल में 3 सहायक अध्यापक, राजेश शर्मा, योगेंद्र यादव, अनूप यादव कार्यरत हैं। प्रधानाचार्य अजय साहू की मेहनत और लगन को देख तीनों शिक्षक भी अपनी सैलरी से 5 फीसदी बच्चों पर खर्च करते हैं। अजय साहू ने कहा- सरकारी तौर पर स्कूल के रख रखाव और स्टेशनरी खर्च के लिए 15 हजार रूपए सालाना मिलता है। अब इतने में तो कुछ हो नहीं सकता। इसलिए मैंने और साथी अध्यापकों ने मिलकर 2 लाख 50 हज़ार रूपए चंदा इकट्ठा कर साल भर में स्कूल में लगाया है। आज हमारे पास बच्चों को पढ़ाने के लिए खुद का कंप्यूटर, प्रोजेक्टर, लाउडस्पीकर, और खेल के सामानों के साथ खुद की लाइब्रेरी भी है। 


रोज तैयार होता है अगले दिन की पढाई का मास्टर प्लान 


अध्यापकों का मानना है कि वह बच्चों के बौद्धिक स्तर को समझ कर उन्हें पढ़ाएंगे तो रिजल्ट हमेशा एक इतिहास ही रचेगा। स्कूल के अध्यापक बच्चों की छुट्टी के बाद अगले दिन बच्चों को पढ़ाए जाने वाले सब्जेक्ट का मास्टर प्लान एक मीटिग कर तैयार करते हैं। स्कूल की अध्यापिका राठौर शशि देवी ने बताया- छुट्टी होने के बाद साथी अध्यापक तकरीबन 1 घंटे रुक-कर आपस में मीटिंग करते हैं। इस मीटिंग में हर अध्यापक अपने अपने सब्जेक्ट और क्लास के एक एक बच्चे का बौद्धिक क्षमता का आकलन आपस में करते हैं। जिससे कमजोर बच्चे को भी वह सामान्य बच्चे के शैक्षिक स्तर तक आसानी से ला पाते हैं।   


निजी स्कूल से नाम कटवाकर यहां लिखवा रहे अभिभावक


प्राथमिक स्कूल का परिसर जितना साफ और स्वच्छ है, उतना ही यहां के बच्चो का अनुशासन और पढ़ाई का स्तर ऊंचा है। सुबह प्रार्थना के समय एक साथ सभी क्लासों के 467 बच्चे एक स्वर में प्रार्थना और कदमताल करते हैं, तो देखने वाले लोग इस बात को यकीन नहीं कर पाते कि यह उसी सरकारी स्कूल के बच्चे हैं, जिसकी तस्वीर हमेसा एक बदरंग सी ही दिखाती है। यहां पढ़ने वाले बच्चे सपना और पुष्पराज बताते है कि उनके माता पिता ने उनको एक निजी स्कूल से नाम कटा कर यहां पढ़ने के लिए इस साल भेजा है। इस सरकारी स्कूल का नाम अपनी जुबां पर बड़े फक्र से लेकर बच्चे बताते है कि डाक्टर और पुलिस के बड़े अफसर बन कर देश की सेवा करना चाहते हैं।