अनमोल ज्ञानकोष है गीता


आचार्य डा0 प्रदीप द्विवेदी


वरिष्ठ सम्पादक-(इडेविन टाइम्स)


गीता हमारे सनातन धर्म के महान ग्रन्थ महाभारत के मध्य भाग में एक अनमोल ज्ञानकोष की भांति संचित है। जीवन जीने की कला तथा नर से नारायण बनने का मार्गदर्शन गीता में विद्यमान है, इसलिए अनेक महापुरूषों ने इसे कर्तव्यज्ञान का अप्रतिम कोष कहा है। भारतीय मनीषियों की मान्यता है कि समस्त भारतीय तत्वज्ञान यदि गायें हैं तो गोपालनन्दन श्रीकृष्ण उनका दूध दुहने वाले पुरूषोत्तम है। गीता भारतीय तत्वज्ञान का सार सर्वस्व उन गायों का दुग्धामृत है।


गीता का प्रारम्भ होता है युद्धभुमि में। एक ओर सात अक्षौहिणी और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना। इनके मध्य में मोहग्रस्त हो जाने के कारण महावीर अर्जुन के हाथों से गाण्डीव शिथिल होने लगा था। विचार करके देखें तो हम सभी जीवन संग्राम के योद्धा हैं। कई बार ऐसे अवसर आ सकते हैं, जब भावनाओं में बहकर हम कर्तव्य का सही निर्णय जब भावनाओं में बहकर हम कर्तव्य का सही निर्णय करने में किंकर्तव्यविमूढ हो जायें और ऐसे अवसरों पर कदाचित हमारा धैर्य छूटे, हम अपनी दुर्बलता को आदर्श वाक्यों से ढंककर पीछे कदम रखना चाहें उस समय गीता की धीर-गम्भीर ध्वनि मानों हमें सावधान करती हुई सी हमारे हृदयों में गूंजने लगेगी। भारत का का इतिहास इसके उपदेश से कितना प्रभावित हुआ, यह तो इतिहास के पन्ने बताते हैं। हमने देखा है कि हमारे राष्ट्र के क्रान्तिकारी बलिदानी वीर इसी ज्योतिर्मय उपदेश की मस्ती में फांसी की रस्सी को चूमते रहे और अत्याचारी लाख उत्पीड़न के बाद भी उनके चेहरे की मुसकान को छीन न सके।


गीता जीवन का चरम तथ्य खोलकर उद्घाटित करने वाला, हृदय की उच्चतम तथा सर्वोत्तम गहराइयों को छू लेने वाला, जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण द्वारा विचित्र परिस्थितियों में गाया हुआ एक अनूठा तथा अनुपम गीत है, जिसके सुर स्वरों को गुनगुनाता हुआ हर मानव जीवन की दुर्गतम घाटियों को पार करता हुआ अपने अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। जीवन की यात्रा को सम्पन्न करने के लिये गीता एक सीधी, सरल तथा सुदृढ पगडंडी का निर्माण कर देती है। इस पर चलता हुआ मानव इहलोक तथा परलोक दोनों की सुख, सिद्धि और आनन्द हस्तगत कर लेता है।


देखिए क्या विचित्र संयोग है। युद्ध का मैदान, रथ पर सवार एक गुरू और शिष्य मित्र के रूप् में। शिष्य ऊपर आसन पर आसीन और गुरू नीचे आसन पर विराजमान। शिष्य, जो श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है इस समय मोह से ग्रसित, विषाद से पीड़ित, कर्तव्य विमुख हो युद्धधर्म से मुंह मोड़े बैठा है। उसके रथ की बागडोर तो गुरू के हाथ में है। उसके धर्म और कर्तव्य कर्म का बोध कराने का उत्तरदायित्व गुरू ने अपने कन्धें पर ले रखा है। उसको कर्तव्यनिष्ठ बनाने के लिये वह भरसक प्रयत्न कर रहा है। एक ओर मोह की ग्रन्थि से जकड़ा हुआ शिष्य और दूसरी ओर उस ग्रन्थि को तोड़ने  में पूर्ण सक्षम गुरू अर्थात भगवान श्रीकृष्ण।


विषाद रोग से भयंकर रूप से युक्त रोगी अर्जुन के हाथ कांप रहे हैं और धनुष हांथ से सरकता जा रहा है। पावं डकमगा रहे हैं, मन अपने वश में नहीं है। मन की स्थिति न्यून और हीन होती जा रही है। वह किसी दशा में भी यह पाप कर्म करने के लिये तैयार नहीं है। तब शिष्य एक हठी बालक की तरह हठ करके बैठ गया है कि हे गोविन्द मैं युद्ध नहीं करूंगा। गुरू ने दोनों सेनाओं के मध्य में रथ को रोक, घोड़ों की बागडोर थामें, शिष्य की ओर पीछे की ओर मूंह करके विचार किया और उस परिस्थिति को संभाला। गुरू नीचे और शिष्य ऊपर। ज्ञान को स्रोत नीचे से ऊपर की ओर बहा। गुरू की वाणीं मुखरित हुई। गीता का गीत गूंज उठा।


क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्वयुपद्यते।
क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्यक्त्वोतिष्ठ परंतप।।


एक सच्चे मित्र की तरह भगवान ने समझाया- अर्जुन! तुम हृदय की दुर्बलता को छोड़ो और युद्ध करो जो इस समय तुम्हारा धर्म है। अर्जुन द्वारा दिए गये तर्कों को काटते हुये श्रीकृष्ण ने समझाया- तू मरने का भय भी मत कर। युद्ध का निश्चय करके तू उठा खड़ा हो। यदि तू युद्ध भुमि में मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा तो स्वर्ग को प्राप्त करेगा। किसी भी कार्य में सफल होना या असफल होना तेरे वश में नहीं है, तेरा अधिकार तो केवल कर्म करने का है। उसका फल तो मुझ जगत नियन्ता के हाथ में है। मुझे तो सुख और दुख दोनों में समान रहना है। मन तथा मस्तिष्क का संतुलन बनाये रखना है।


गीता हर प्रकार की चिन्तओं से मुक्त कर व्यक्ति को चिन्तन से जोड़ देती है। जीने की पूर्ण कला सिखाती है गीता। जीवन का कोई भी पहलू भगवान की वाणीं से अछूता नहीं रहा। चाहे वह मन से जुड़ा हो या मस्तिष्क से। मन चंचल स्थिति में है तो गीता उसका उपचार अभयास और वैराग्य की औषधि से करती है जो एक अचूक दवा है। मन के घोड़ो को रोकने के लिये इससे बढ़कर कोई अंकुश नहीं हो सकता। लहरों को वश में कर पाना बड़ा कठिन है परन्तु गीता ऐसा शक्तिपात करती है कि धीरे-धीरे वे सभी लहरें बांध में आ जाती हैं। गिरकर फिर मानव इसी युक्ति से संभल पाता है। जीवन में संचेतना भर देनें वाली गीता दूसरी पतित पावनी गंगा है जिसमें हर व्यक्ति गोता लगाकर भवसागर के भयंकर तूफानों से बचकर निकल जाता है और इसी गीता ज्ञान की अग्नि से अपने किये हुये पाप कर्मों को जलाकर शुद्ध और पवित्र हो जाता है और चंचल मन को स्थिर कर संयम की सीढी पर चढ़ना जान जाता है। कोई भी ऐसी समस्या नहीं जिसका निदान गीता में न हो।


यह संसार दुखों का घर है। गीता इससे भागने का नहीं इस को जानने का संदेश देती है। सावधान होकर कर्म करते रहने की प्रेरणा देती है। कर्मयोगी को कर्म का रास्ता, ज्ञानी को ज्ञानमार्ग का रास्ता तथा भक्ति पथ पर चलने वाले को भक्ति के सोपान बताकर तीनों गुणों का अलग-अलग प्रतिपादन करती है गीता। निराशा से दूर ले जाकर यह ऐसे प्रकाश में खड़ा कर देती है जहां निराशा के अंधकार का प्रवेश ही नहीं कर्म, भक्ति तथा ज्ञान का सम्पूर्ण समन्वय है। 


इसे एसे समझिए- यदि कर्म का बीज बोओगे, भक्ति के फूल आयेंगे तो ज्ञान का फल चखने को मिलेगा। यथार्थ में मानव जीवन का सार तथा मूल नीवं कर्म ही है इसलिए निश्चेष्ट तथा निष्क्रिय हुये अर्जुन को भगवान ने कर्मों की संजीवनी पिला दी। अन्त में अर्जुन कह उठा- ''नष्टोमोहः स्मृतिल लब्धाः।'' पुनः श्रद्धा और विश्वास को हृदय में भर हाथ जोर नतमस्तक हो बोल उठा- ''करिष्ये वचनं तव'' क्योंकि उसने गीतामृत का पान कर लिया था। गीता के प्रत्येक वाक्य ने उसे जीवन जीने की कला सिखा दी थी ।


गीता प्रत्येक व्यक्ति के लिये कर्तव्य कर्मों का बोध कराता हुआ एक दर्पण, समाज के लिये एक अमूल्य निधि, एक अनूठी धरोहर और विश्वभर के लिये सत्यपथ का प्रदर्शन करता हुआ एक ईश्वरीय संदेश है। कर्तव्य से विमुख हुये मन को झकझोर कर उठाती है यह गीता और जीवन संघर्ष से लड़ने के लिये प्रेरित करती है। जीवन में सफलता मिले या असफलता का मुख देखना पड़े मन की स्थिति को सम बनाये रखना औ अपने पग आगे बढ़ाते जाना ही गीता का उपदेश है न कि हार कर बैठ जाना। यह एक बुद्धिवादी ग्रन्थ है। गीता की प्रभा पर काल का प्रवाह नहीं चला। गीता एक ऐसी कृति है जो अमर है।